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Saturday, May 24, 2025

श्री शारदा माता मंदिर तेजगढ़ 500 वर्ष पुराना

 श्री शारदा माता मंदिर

श्री शारदा माता मंदिर की स्थापना का इतिहास लगभग 500 वर्ष पुराना माना जाता है। कहा जाता है कि तेजगढ़ के राजा तेजीसिंह लोधी ने माता की प्रतिमा को एक काले पत्थर के रूप में स्थापित किया था। उस समय यह स्थान एक सघन वन था, और राजा ने अपनी कुलदेवी के रूप में माता की स्थापना की थी।



समय के साथ यह स्थान लगभग 400 वर्षों तक वीरान पड़ा रहा। फिर एक दिन भुन्दू लाल सेन नामक व्यक्ति जंगल में लकड़ियां काटने गए और रास्ता भटक गए। रात में उन्होंने एक चमत्कार देखा—एक वृद्ध महिला ने उन्हें माता की पुरानी मूर्ति को पुनः स्थापित करने का निर्देश दिया। बाद में यह स्पष्ट हुआ कि वह वृद्ध महिला स्वयं माता शारदा थीं।


मंदिर से जुड़ी मान्यताएँ


श्री शारदा माता मंदिर मध्य प्रदेश के दमोह जिले में स्थित एक प्रसिद्ध धार्मिक स्थल है। यह मंदिर दमोह-जबलपुर मार्ग पर पतलोनी (तेजगढ़) में स्थित है।

यह मंदिर भक्तों के लिए एक आस्था का केंद्र बना हुआ है। मान्यता है कि यहां आने वाले श्रद्धालुओं की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

मध्य प्रदेश के दमोह जिले से 34 किलोमीटर दूर, दमोह जबलपुर मार्ग पर स्थित पतलोनी (तेजगढ़) में "श्री शारदा माता का मंदिर" स्थित है।। यहां वैसे तो आम दिनों में भी भक्तों की भीड़ लगी रहती है, लेकिन शारदीय नवरात्रि एवं पूर्णिमा के दिनों में तो यहां अन्य जिले एवं अन्य राज्यों के भक्त भी पहुंचते हैं।। यहां की मान्यता है कि यहां भक्तों की सभी मुरादें पूर्ण होती हैं।।मंदिर के पीछे एक बहुत ही प्राचीन एवं बृहत् इतिहास छिपा हुआ है। मंदिर के संदर्भ में कहा जाता है कि लगभग पांच सौ वर्ष पहले जब तेजगढ़ के राजा तेजीसिंह लोधी ने माता की स्थापना की थी, उस समय माता की प्रतिमा एक काले पत्थर के रूप में थी। काले पत्थर पर अंकित माता का चित्रण बड़ी ही कलाकारी के साथ किया गया था।।यह स्थान पांच सौ वर्ष पहले एक बहुत ही सघन वन के रूप में था और राजा ने अपने गढ़ तेजगढ़ से दो किमी दूर जंगल में अपनी कुलदेवी के रूप में माता की स्थापना की थी।। तब यहां कोई मंदिर नहीं था एक बहुत ही विशाल एवम् प्राचीन पीपल को वृक्ष के नीचे माता की पत्थर पर चित्र वाली मूर्ति की स्थापना खुद राजा तेजीसिंह ने अपने हाथ से की थी।। राजा प्रतिदिन माता की पूजा अर्चना करने जाते थे।।राजा के मरणोपरांत ये स्थान लगभग 400 वर्ष तक वीरान पड़ा रहा।। फिर एक दिन भुन्दू लाल सेन जंगल में लकड़ियां काटने गयैे थे तो घने जंगल में ये मार्ग भूल गये और रात होने के कारण इनको जंगल में कोई सुरक्षित स्थान भी ढूंढना था।। घना जंगल था और जंगली जानवर भी बहुत थे, अंततः इनको वही पीपल का वृक्ष मिला।। वो वहीं पर विश्राम करने के लिये बैठ गये।। तब उनको अचानक शेर के दहाड़ने की आवाज सुनाई दी और वो डर के कारण पेड़ पर चढ़ गये।




थोड़ी देर पश्चात जब और अंधकार हो गया और शेर की आवाज भी बंद हुई तब ये पेड़ के नीचे बने चबूतरे पर पुनः वापस आ गये और सहमकर सुबह होने का इंतजार करने लगे। और तभी वहां एक चमत्कार देखा और चमत्कार में क्या देखा...?

वहां पर एक बुढ़िया दिखी । बुढ़िया उनके पास आई और बुढ़िया ने वहां चबूतरे पर जो माता की मूर्ति थी जिसकी राजा तेजीसिंह लोधी ने स्थापना की थी, जो कि अब वहां पत्तों और मिट्टी में दब चुकी थी। वो जगह बिल्कुल वीरान हो चुकी थी। उस बुढ़िया ने चार सौ वर्ष पुरानी वो माता की मूर्ति उनको निकालने को कहा।। भुन्दू लाल सेन जी ने वह मूर्ति बहुत मेहनत करके अंततः निकाल ही ली।। और पुनः बुढ़िया की अगली आज्ञा की प्रतीक्षा थी। पुनः बुढ़िया ने कहा- कि तुम इस स्थान को पुनः सुधार करके यहां माता की पूजा पाठ रोज करो।भुन्दू लाल सेन जी को बुढ़िया ने वहां का संपूर्ण इतिहास बताया और वहां की छोटी छोटी बातों से अवगत कराया। रात्रि का अंतिम पहर था सुबह लगभग होने को थी।


अंत में भुन्दू लाल सेन जी ने उस बुढ़िया से प्रश्न किया - आप कौन हो...? और इस घने जंगल में इस प्रकार अकेली कैसे रहती हो..? और यहां ये स्थान के बारे में और माता के इतिहास के बारे में कैसे जानती हो...?


तब वह बुढ़िया माई ने अपना साक्षात् रूप धारण किया वो बुढ़िया कोई और नहीं स्वयं माता जगत् जननी शारदा मां थीं। भुन्दू सेन माता के चरणों में गिर पड़े। और दंडवत प्रणाम किया। माता ने उनको कहा - कि यहां इस स्थान पर जो भी भक्त दर्शन करने आयेगा उसकी प्रत्येक छोटी बड़ी सभी मनोकामनाएं पूरी होंगी।। और ऐंसा कहकर माता अंतर्ध्यान हो गईं।फिर सुबह जब भुन्दू लाल सेन जब घर लोटे तो उन्होंने सारी बातें अपने घर वालों और गांव वालों को बताईं... तब गांव के कुछ लोग कहानी की सत्यता का परीक्षण करने को जंगल में गये। और चबूतरे पर माता की मूर्ति को विराजमान देखा तो सभी अचरज में पड गये और भुन्दू लाल सेन की बातों का सबने विश्वास किया.... और अब सबने मिलकर चबूतरे को और माता के उस स्थान को पुनः सुधार करके और पुर्ननिर्माण करके और पुनर्स्थापना करके माता की रोज पूजा पाठ करने लगे।। गांव के सभी लोग वहां जंगल में समय मिलने पर जाते थे और माता की पूजा करते थे।



१९६० में भुन्दूलाल सेन जी द्वारा वहां मंदिर के निर्माण का कार्य शुरू कर दिया..... अभी भी वो एक घना जंगल ही था.....कुछ समय पश्चात १९८० के लगभग माता की नई प्रतिमा स्थापित की गई एवं भव्य मंदिर का पुनर्निर्माण किया गया।। एवं मंदिर के प्रथम मंहत श्री भुन्दूलाल सेन जी नियुक्त किये गये। और फिर यहां रोज हजारों की संख्या में भीड़ आने लगी और मंदिर के आसपास ही पूरा गांव भी बस गया। २००५ में महंत श्री भुन्दूलाल सेन जी ब्रह्मलीन हो गये।। फिर उसके पश्चात उनके पुत्र श्री भगवत सेन जी को वहां का महंत नियुक्त किया गया जो कि वर्तमान में भी वहीं पर कार्यरत हैं।। अब इस स्थान के आसपास और भी आबादी बस गई है.... एवं वहां लगभग दो एकड़ के एरिया में अन्य देवी देवताओं के मंदिरों का निर्माण किया गया है। सभी मंदिरों की देखरेख और पूजा-पाठ का जिम्मा वहां के द्वितीय मंहत श्री भगवत सेन जी के हाथ में है।। एवं प्रत्येक पूर्णिमा और नवरात्रि में यहां पर हजारों की संख्या में, श्रद्धालु आते हैं।। एवम् विशेषतः कार्तिक नवरात्रि और चैत्र नवरात्रि से पूर्णिमा तक पंद्रह दिनों का मेला लगता है।

एवं २०१७ में यहां के वर्तमान महंत श्री भगवत सेन द्वारा मंदिर के लिये चेरिटेबिल ट्रस्ट का निर्माण किया है। जिससे धार्मिक स्थलों पर उन्नति एवं समाजसेवी कार्य किये जा सकें।। समाजसेवा कार्यो के साथ गौसेवा, विद्यालय निर्माण, एवं वृद्धाश्रम निर्माण प्रमुख हैं



मंदिर का वातावरण

मंदिर एक सघन वन क्षेत्र में स्थित है, जो इसे एक शांत और आध्यात्मिक स्थान बनाता है। यहां एक विशाल पीपल का वृक्ष भी है, जिसके नीचे माता की मूर्ति पहले स्थापित की गई थी।

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