ई-उपार्जन पोर्टल की विफलता: किसान की तपस्या और सिस्टम ,सरकार की मंशा पर उठते सवाल
ई-उपार्जन पोर्टल की विफलता: किसान की तपस्या और सिस्टम की लाचारी
लेखक: IGAF | श्रेणी: कृषि एवं तकनीक | कॉपीराइट: सर्वाधिकार सुरक्षित (IGAF)
एक किसान के लिए फसल उगाना जितनी बड़ी तपस्या है, उसे सही दाम पर बेचना आज उससे भी बड़ी चुनौती बन गई है। ई-उपार्जन पोर्टल की तकनीकी खामियां और प्रशासनिक ढिलाई सीधे तौर पर किसान की कमर तोड़ रही हैं। इस साल पोर्टल की लचर व्यवस्था ने हजारों किसानों को अधर में लटका दिया है।
1. NIC और तकनीकी विफलता का असली कारण
अक्सर सवाल उठता है कि NIC (National Informatics Centre) जैसा बड़ा संस्थान इस समस्या को ठीक क्यों नहीं करता? यहाँ यह समझना जरूरी है कि पोर्टल की कार्यक्षमता केवल तकनीक पर नहीं, बल्कि प्रशासनिक इच्छाशक्ति पर भी निर्भर करती है।
- सर्वर क्षमता (Server Load) का संकट: जब हजारों किसान एक साथ स्लॉट बुकिंग की कोशिश करते हैं, तो सर्वर 'क्रैश' हो जाता है। यदि सरकार चाहती, तो 'क्लाउड सर्वर' का उपयोग कर इसकी क्षमता को तुरंत बढ़ाया जा सकता था, जैसा कि बड़ी प्राइवेट कंपनियां करती हैं। लेकिन बजट और निर्देशों के अभाव में ऐसा नहीं किया गया।
- डेटा सिंकिंग की समस्या: पोर्टल के धीमा होने का एक मुख्य कारण डेटा सिंकिंग है। अक्सर वेरिफिकेशन और बैंक विवरणों के मिलान में अत्यधिक देरी होती है, जिससे पूरा सिस्टम जाम हो जाता है और किसान घंटों कंप्यूटर के सामने बैठा रहता है।
2. सरकार की मंशा पर उठते सवाल
पोर्टल पंजीयन के समय से ही धीमा है, और अब स्लॉट बुकिंग के समय भी हजारों किसान केंद्रों के चक्कर काट रहे हैं। किसान के गेहूं की धुलाई तो हो गई है, लेकिन वह अपनी फसल को पोर्टल पर दर्ज नहीं कर पा रहा है।
क्या पोर्टल का यह लचर प्रदर्शन सरकार के दबाव में है? या फिर सरकार की मंशा समय पर खरीदी करने की नहीं है? जब तक लिखित शिकायतों पर ठोस कार्रवाई नहीं होगी, तब तक किसान यही मानने पर मजबूर रहेगा कि उसे जानबूझकर परेशान किया जा रहा है।
3. मंडी में शोषण और प्रशासनिक मूकता
पोर्टल की खराबी का सीधा लाभ व्यापारियों को मिल रहा है। मंडी में किसानों की फसलों को कम दामों पर खरीदा जा रहा है। अधिकारियों की पोर्टल के प्रति अनदेखी और सरकार का मूक बने रहना, किसानों के लिए 'कोढ़ में खाज' जैसा साबित हो रहा है। किसान आज बेसहारा और मजबूर महसूस कर रहा है।
4. जवाबदारी किसकी?
किसान कहां जाए और क्या करे? इस अव्यवस्था की जवाबदारी लेने को कोई तैयार नहीं है। प्रशासन को चाहिए कि वह तकनीकी सुधारों को प्राथमिकता दे और यह सुनिश्चित करे कि किसी भी किसान को तकनीकी खराबी के कारण अपनी मेहनत की कमाई कम दाम पर न बेचनी पड़े।
5. किसान अभी क्या कदम उठा सकते हैं?
अगर पोर्टल और स्थानीय अधिकारियों से राहत नहीं मिल रही है, तो इन विकल्पों को आज़माया जा सकता है:
- CM हेल्पलाइन (181): मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में (जहाँ ई-उपार्जन प्रमुख है) 181 पर कॉल करना काफी प्रभावी होता है। यहाँ की गई शिकायत का रिकॉर्ड रहता है और अधिकारियों को जवाब देना पड़ता है।
- सोशल मीडिया का सहारा: अपनी समस्या को वीडियो या फोटो के साथ ट्विटर (X) पर कृषि मंत्री, मुख्यमंत्री और जिले के कलेक्टर को टैग करके पोस्ट करें। डिजिटल युग में सोशल मीडिया का दबाव अक्सर काम कर जाता है।
- किसान संगठन: व्यक्तिगत लड़ाई के बजाय स्थानीय किसान संगठनों के माध्यम से जिला कलेक्टर को ज्ञापन देना ज्यादा प्रभावी होता है, क्योंकि सामूहिक आवाज को दबाना प्रशासन के लिए मुश्किल होता है।
महत्वपूर्ण रिसोर्स लिंक (Data Descriptions)
किसान भाइयों की सहायता के लिए कुछ उपयोगी कड़ियाँ:
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